पंच महाभूत तत्त्वों के बारे में ये जान लिया तो जीवन बदल जाएगा | All About Panch Mahabhutas

मानव शरीर संसार का एक छोटा सा परन्तु सम्पूर्ण नमूना है। इसके अन्दर के विभाग हमें आश्चर्य चकित कर देते हैं। जो इस जगत में है. वह इस शरीर में भी है। इसी से ‘यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे’ महत्त्वपूर्ण कथन निकला है। आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से मनुष्य का शरीर चौबीस तत्त्वों का सम्मिश्रण है। यह मन, बुद्धि, आत्मा, पांच ज्ञानेन्द्रियां, पांच कर्मेन्द्रियाँ, पांच महाभूत तत्वों और षट धातुज तत्त्वों से मिलकर बना है।

हाथ, पैर, मुँह, जननेन्द्रि और गुदा पांच कर्मेन्द्रियाँ हैं। स्पर्श करने वाली त्वचा, देखने वाली आंखें, सुनने वाले कान, सूंघने वाली नाक तथा रस या स्वाद को पहचानने वाली जीभ पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि मज्जा एवं शुक्र शरीर की धातुएं हैं। वात, पित्त और कफ शरीर के तीन दोष हैं। पाँच तत्त्वों से बना होने के कारण यह शरीर पंच तत्त्वात्मक कहा जाता है। आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा पृथ्वी पाँच महाभूत हैं। इन्हीं पर आधारित पाँच तन्मात्राएं शब्द, स्पर्श, रूप, रस, तथा गंध हैं। आइये जानते हैं इन पंच महाभूतों से हमारा शरीर कैसे निर्मित हुआ है-

आकाश तत्व

आकाश तत्व तत्त्व शरीर के विशुद्धि चक्र में स्थित है। इसका स्थान कण्ठ है। मस्तिष्क का भाग आकाश तत्त्व का अंश है। यह सबसे पहला तथा सबसे बड़ा तत्त्व है। जो छिद्र है, वही आकाश तत्त्व है। सृष्टि में आकाश तत्त्व प्रधान है। आकाश सर्वव्यापक है। आकाश का अर्थ रिक्त स्थान अथवा ‘आकाश देने वाला है। शरीर में इसके रहने तथा कार्य करने के स्थान अधिकतर कान व मुख इन्द्रियां हैं। इसका रंग आसमानी अर्थात् हलका नीला है।

आकाश तत्व का गुण अथवा तन्मात्रा ‘शब्द’ अथवा ‘आवाज’ है। इसका स्वभाव ठण्डा है। इसका कर्म फैलने वाला तथा शान्तिदायक है। जब शरीर के भीतरी अथवा बाहरी किसी भी अंग में किसी भी कारण से अग्नि तत्त्व अथवा पित्त या गर्मी की वृद्धि हो जाती है, तो आकाश तत्त्व अमृत के समान अति उत्तम तथा लाभदायक सिद्ध होता है। यह अनेकों रोगों का विष नाशक है। सिरदर्द, ज्वर, वमन, हिचकी, प्रमेह, आंखों के रोग, खसरा, चेचक, अतिसार, मिर्गी, हैजा, खूनी बवासीर, त्वचा रोग तथा मानसिक रोगों में अत्यन्त लाभदायक है। खुश्की प्यास को रोकने वाला तथा शान्ति देने वाला है।

आकाश तत्व की अधिकता से मल, मूत्र, जिव्हा, नेत्र तथा नाखून आदि सफेद होने लगते हैं। शरीर में सुस्ती आने लगती है। नींद की अधिकता हो जाती है। भूख प्यास, पसीने की कमी हो जाती है। मुँह का स्वाद मीठा हो जाता है। आकाश तत्त्व की अत्याधिकता में कान में बहरापन अथवा गूँ-गूँ का शब्द उत्पन्न हो जाता है। कफ शीत का वेग होकर मृत्यु तक हो सकती है।

आकाश तत्त्व की न्यूनता में मल, मूत्र, जिव्हा नेत्र तथा नाखून पीले रंग के हो जाते हैं । पित के हरे पीले दस्त तथा शरीर का रंग पीलापन ले लेता है तथा पांडू रोग हो जाता है। भूख प्यास, पसीना अधिक हो जाता है। प्राय: हैजा हो जाता है। रोगी का स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है। आकाश तत्त्व अधिकतर अग्नि तत्त्व को दबा देता है। इसका विपरीत तत्त्व अधिकतर अग्नि तत्त्व ही होता है। आकाश तत्त्व उदय होकर कुल 10 पल अथवा 4 मिनट तक ही विद्यमान रहता है। ढाई घड़ी में क्रमश: पांचों तत्त्वों का उदय होता है। (2 ½ घड़ी, 1 घंटा अथवा 60 मिनट के बराबर होते हैं।) आकाश तत्त्व का प्रमाण अर्थात् लम्बाई का माप 20 अंगुल होता है।

यदि मुँह से तीखा स्वाद जान पड़े तो आकाश तत्त्व की उपस्थिति समझनी चाहिए।

आकाश तत्त्व की पूर्ति हम अपने दैनिक जीवन में उपवास द्वारा करते हैं। यह प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति का एक प्रमुख अंग है। हमारे शरीर के अंग दोषपूर्ण भोजन, अत्याधिक श्रम, कम सोना. दूषित जीवन पद्धति के कारण विजातीय द्रव्यों से भर जाते हैं, तो उपवास से उन्हें विश्राम मिलता है। जीवनी शक्ति को शरीर से विजातीय द्रव्य को बाहर निकालने का अवसर मिलता है। हमारा शरीर स्वस्थ एवं चित्त निर्मल होता है। उपवास एक तप है। इसके लिए मन को सुदृढ़ तथा शरीर को तपाना पड़ता है। जलोपवास, रसोपवास अथवा फलोपवास ही उपवास के मुख्य तीन श्रेष्ठ प्रकार हैं। उपवास दो शब्द से मिलकर बना है। उप+वास। उप का अर्थ है ‘समीप’ तथा वास का अर्थ है ‘रहना। अर्थात् भगवान के समीप रहना।

वायु तत्त्व

इस शरीर रूपी नगर में वायु राजा के समान है। हृदय से भौहें के मध्य भाग तक वायु तत्त्व का अंश है। इसका मुख्य स्थान अनाहत चक्र में है। वायु तत्त्व का रंग हरा है। इसका गुण अथवा तन्मात्रा स्पर्श है जो संचार करता है, वह वायु तत्त्व है।
वायु दस प्रकार की होती है।

  1. प्राण वायु – प्राण वायु का निवास ‘हृदय’ में रहता है
  2. अपान वायु – अपान वायु का निवास ‘गुदा में रहता है
  3. समान वायु – समान वायु का निवास ‘नाभि देश में रहता है।
  4. उदान वायु – उदान वायु का निवास ‘कण्ठ के मध्य भाग में रहता है।
  5. व्यान वायु – व्यान वायु का निवास “सम्पूर्ण शरीर में रहता है।
  6. नाग वायु – डकार के साथ निकलने वाली वायु को नाग वायु कहते हैं।
  7. कूर्म वायु – इस वायु के द्वारा आंखों की पलकें खुलती तथा बन्द होती है।
  8. कृकल वायु – छींकते समय निकलने वाली वायु को “कृकल वायु कहते हैं।
  9. देवदत्त वायु – जंभाई लेते समय जो वायु शरीर के भीतर प्रवेश करती है। उसे ‘देवदत्त वायु कहते हैं।
  10. धनंजय वायु – यह वायु सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त रहती है। मरने पर भी यह शरीर को छोड़कर नहीं जाती।

इनमें पहली पांच प्रकार की वायु ‘प्राण वायु तथा अन्तिम पांच प्रकार की वायुओं को ‘उप-प्राण वायु कहते हैं। वायु ग्रहण करने को निःश्वास तथा वायु परित्याग करने को प्रश्वास कहते हैं। यह निःश्वास नासिका के दोनों छिद्रों से एक ही साथ नहीं चलता अपितु कभी दायें स्वर से तथा कभी वाम स्वर से चलता है। शरीर में बाईं ओर इड़ा है, दाहिनी ओर पिंगला है, और बीच में सुषुम्ना है। इड़ा नाड़ी में चन्द्रमा का वास है तथा पिंगला में सूर्य का वास है। नाक के बाएं छिद्र से चलने वाले स्वर को चन्द्र स्वर अथवा गंगा स्वर कहते हैं। इस स्वर के भगवान स्वयं ब्रह्मा जी हैं।

नाक के दाहिने छिद्र से चलने वाले स्वर को सूर्य स्वर अथवा यमुना स्वर कहते हैं। इस स्वर को भगवान विष्णु संचालित करते हैं। सुषुम्ना नाड़ी दोनों के बीच में चलती है। इसे सरस्वती स्वर भी कहते हैं। आकाश तत्त्व के रूद्र भगवान शिव जी हैं।

वायु तत्त्व का स्वभाव सर्द, खुश्क, वात कारक तथा शान्तिदायक है। अग्नि व आकाश तत्त्व अर्थात् पित्त, कफ शोधक और जल तत्त्व सड़न तथा खमीर का विषनाशक है। वायु तत्त्व का कर्म हिलना, बहना तथा चंचलतायुक्त है। जब शरीर के भीतरी अथवा बाहरी किसी भी अंग में किसी भी कारण से अग्नि तत्त्व तथा आकाश तत्त्व अर्थात् पित्त या कफ बढ़ जाएं अथवा कम हो जाएं तो वायु तत्त्व का प्रयोग करने से अति उत्तम लाभ होता है।
वायु तत्त्व की अधिकता से शरीर के भिन्न-भिन्न भागों में दर्द रहने लगता है। मिर्गी तथा हिस्टिरिया जैसे मानसिक रोग पैदा होने लगते हैं। सभी प्रकार के जखम नासूर, कारबैंकल आदि उत्पन्न होते हैं। ज्ञान तन्तुओं में फड़कन होती है। आंखों तथा नाखुनों में हरियाली आ जाती है। कानों में अधिक आवाज सुनाई देने लगती है। मल फूला हुआ तथा मूत्र झागदार होता है। मुँह का स्वाद कसैला हो जाता है।
वायु तत्त्व की न्यूनता में रोगी का स्वभाव स्थिल हो जाता है। वह चुपचाप पड़ा रहता है। उदासीनता उसे चारों ओर से घेर लेती है। उसका सिर भारी हो जाता है। उसे मानसिक थकान का अनुभव होने लगता है। वह बहरा तथा गूंगा तक हो जाता है। वायु तत्त्व अधिकतर जल तत्त्व को दबा सकता है। वायु तत्त्व के विपरीत अधिकतर अग्नि तत्त्व होता है। यदि नासा-छिद्र से तिरछा श्वास चले अर्थात् एक ओर श्वास चले तो वायु तत्त्व का उदय समझना चाहिए।

यदि मुँह का स्वाद खट्टा जान पड़े तो वायु तत्त्व की उपस्थिति समझनी चाहिए। वायु तत्त्व 20 पल अथवा 8 मिनट तक विद्यमान रहता है। इसका प्रमाण 8 अंगुल होता है। यदि एक निर्मल दर्पण पर जोर से श्वास छोड़े, उसके फलस्वरूप दर्पण पर लम्ब-गोल आकृति (अण्डाकृति) बने तो वायु तत्त्व का उदय समझना चाहिए। मानव साधारण रूप से एक मिनट में 15-16 बार श्वास-प्रश्वास लेता है। स्वस्थ व्यक्ति 24 घन्टे में 22,600 श्वास लेता है। श्वास-प्रश्वास को संयमित करने से आयु बढ़ाई जा सकती है। वायु के बिना प्राणी कुछ ही क्षणों में प्राण त्याग देता है। ताजी वायु के सेवन से फेंफड़ों की वृद्धि भलिभांति होती रहती है।

अग्नि तत्त्व

अग्नि तत्त्व का रंग लाल है। जो उष्ण अथवा गर्म है, वह अग्नि तत्त्व है। गुदा से हृदय तक का भाग अग्नि तत्व है। वास्तव में इसका वास सर्वत्र बिजली के समान है। अधिकांश नेत्र, ज्ञानेन्द्रिय, पुरुष लिंग एवं स्त्री योनि कर्मेन्द्रिय में अग्नि तत्व वास करता है। इसका गुण अथवा तन्मात्रा रूप है। रोशनी तथा देखने की शक्ति इसका गुण ही है। इसका स्वभाव अति गरम खुश्क, उत्तेजक तथा पित्त कारक है।
अग्नि तत्त्व आकाश तत्त्व तथा वायु तत्त्व का शोधक है और जल तत्त्व का नाशक है। हमारे दैनिक जीवन में तेज उष्मा, गर्मी या अग्नि तत्त्व का घनिष्ट सम्बन्ध है। सूर्य के बिना सृष्टि की कल्पना करना असम्भव है। सूर्योदय होते ही पशु-पक्षी अपना दैनिक कार्य प्रारम्भ कर देते हैं। जैसे पानी का स्नान करके हम साफ रहते हैं उसी प्रकार सूर्य स्नान लेनेसे भी हम साफ और तन्दुरूस्त रह सकते हैं।
हमारे शरीर की हड्डियों की बनावट में कैल्शियम्, फास्फोरस तथा विटामिन का विशेष स्थान है। सूर्य की किरणों से हमें विटामिन ‘डी’ प्राप्त होता है। धूप त्वचा द्वार से हमारे शरीर से गन्दगी निकालती है। सूर्य रश्मि नेत्र ज्योति बढ़ाने में बहुत सहायक है यक्ष्मा के कीड़े उबलते पानी में न मरने पर भी सूर्य की किरणों द्वारा बहुत शीघ्र नष्ट हो जाते हैं। हमारे ऋषि-मुनि सूर्यदेव के महत्त्व को भली-भांति समझते एवं उसका पालन करते थे। हमारे प्राचीन ग्रन्थों वेद एवं उपनिषद् आदि में सूर्यदेव की रोग निवारक महिमा का स्पष्ट वर्णन मिलता है। द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण के पुत्र साम्ब को कुष्ट रोग हो गया था, वह सूर्य किरण चिकित्सा से ही ठीक हुआ था।

अग्नि तत्त्व ऊपर की ओर चलता है। यह तीव्र उत्तेजक भी है। इसकी अधिकता से शरीर के नेत्र, नाखून, जिव्हा, मल, मूत्र आदि सुर्ख लाल, गुलाबी अथवा तेज पीले पाये जाते है। मुँह का स्वाद खट्टा, कड़वा, चरपरा (तिक्त) मिश्रित होता है। स्वभाव तेज गुस्से वाला तथा शरीर दुबला, पतला तथा चंचलतायुक्त होता है। इस तत्त्व की अत्याधिकता में प्रायः शरीर गर्म अथवा ज्वर हो जाता है। मुँह तथा नाक खुश्क हो जाते हैं। प्यास अधिक लगती है। कानों में झनझनाहट पाई जाती है। पतले दस्त लग जाते हैं। अग्नि तत्त्व की न्यूनता में शरीर में सुस्ती आ जाती हे। सर्दी लगने लगती है। नींद अधिक आती है। भूख की कमी हो जाती है। नेत्र, नाखून, जिव्हा, मल-मूत्र आदि में कुछ सफेदी आ जाती है। नाखूनों में बारीक-बारीक अथवा मोटी-मोटी लकीरें दिखाई देने लगती है।

अग्नि तत्त्व अधिकतर जल तत्त्व तथा वायु तत्त्व को दबा देता है। इसका विपरीत तत्त्व मुख्य रूप से आकाश तत्त्व होता है। अग्नि तत्त्व 30 पल अथवा 12 मिनट तक विद्यमान रहता है। अग्नि तत्त्व का प्रमाण अथवा लम्बाई का माप 4 अंगुल होता है।

किसी एक निर्मल दर्पण को लेकर उस पर जोर से श्वास छोड़ें, तो उसके फलस्वरूप दर्पण पर यदि त्रिकोणाकृति बने तो अग्नि तत्त्व का उदय समझना चाहिए।

यदि नासा-छिद्र से श्वास ऊपर की ओर चल रहा हो तो अग्नि तत्त्व का उदय समझना चाहिए। यदि मुँह का स्वाद कड़वा जान पड़े तो अग्नि तत्त्व की उपस्थिति समझनी चाहिए।

जल तत्त्व

घुटने से गुदा मार्ग तक का भाग जल तत्त्व का अंश है। जो तरल और द्रव है, वह जल तत्त्व है। जल तत्त्व का निवास स्थान ‘स्वाधिष्ठान चक्र में रहता है। इसका गुण अथवा तन्मात्रा रस अथवा स्वाद ज्ञात होने की शक्ति का है। इसका स्वभाव शान्तिप्रद है। यह कफ शोधक, रक्त वर्धक, शक्तिवर्धक तथा वीर्यवर्धक है। यह फेफड़ों से बलगम तथा आन्तों से मल को निकालने वाला है।

जल तत्त्व वरम (सूजन) तथा सड़न को कम करने में उत्तम लाभकारी है। इसका कर्म ऊपर से नीचे गिरने का है। यह मृतक को गलाने तथा जीवित को बढ़ाने में सहायक है। यह विजातीय द्रव्य को शरीर से बाहर निकालता है। यह शरीर में तापमान का सन्तुलन करता है। जब शरीर के किसी अंग में किसी भी कारण से वायु तत्त्व, अग्नि तत्त्व अथवा पृथ्वी तत्त्व बढ़ जाते हैं, तो जल तत्त्व का प्रयोग अत्यन्त लाभदायक होता है।

जल तत्त्व शरीर के विष को बाहर निकालकर मनुष्य को पूर्ण आरोग्यता तथा उत्तम स्वास्थ्य देता है। यदि नासा-छिद्र के मध्य में श्वास चल रहा हो तो जल तत्त्व का उदय समझना चाहिए। यदि किसी एक निर्मल दर्पण को लेकर उस पर जोर से श्वास छोड़ें और उसके फलस्वरूप दर्पण पर यदि अर्धचन्द्राकार आकृति बने तो जल तत्त्व का उदय समझना चाहिए। जल तत्त्व का प्रमाण अर्थात् लम्बाई का माप 16. अंगुल होता है। इस तत्त्व की अवधि 40 पल अथवा 16 मिनट होती है। इस तत्त्व का स्वाद कषाय होता है। जल का प्रयोग चन्द्र स्वर में करना चाहिए। जल की उपयोगिता सर्वविदित है।

अप्सु अमृतम् अप्सु भेषजम्। अर्थात् जल में अमृत है। जल में औषधि है। जल का अर्थ, ज- जन्म+ल-लय है। जो तत्त्व हमारे जन्म से लय तक हमारा साथी हो, वह जल कहा गया है। जो जल का उत्तम प्रयोग करना जानते हैं, उनके लिए जल माता और बहिन के समान हितकारी होता है।

जल ही जीवन है। जल विश्व के समस्त प्राणियों का प्राण है। हमारे शरीर का 70% भाग जल ही है। जल आक्सीजन तथा हाइड्रोजन नामक दो गैसों से मिलकर बना है। (2H,+2H,0) है। लुई कूने के कटिस्नान, मेहन स्नान, वाष्प स्नान तथा सूर्य स्नान चार प्रसिद्ध स्नान हैं। हमारे शरीर में जल का सन्तुलन भार 2200 मि.लि. होता है। ‘जल द्वारा शरीर में अनेकों कार्य सम्पादित होते हैं। यह शरीर में स्नेहन का कार्य करता है।

पीने के लिए गहरे कुएं का पानी उत्तम माना जाता है। पानी छानकर अथवा उबालकर पीना चाहिए। कहावत भी है:- ‘पानी पीजे छानकर, गुरु कीजे जानकर’ जल तत्त्व की अधिकता से शरीर में कुछ सुस्ती आ जाती है। नींद अधिक आती है। मुंह का स्वाद मीठा, कसैला मिश्रित साबुन जैसा प्रतीत होता है। मूत्र का रंग हल्का सफेद हो जाता है। जिव्हा कुछ मैली सफेद हो जाती है तथा कुछ कब्ज रहने लगती है।

जल तत्त्व की कमी से शरीर तथा आंते गरम हो जाती हैं। कभी-कभी ज्वर या पतले दस्त होने लगते हैं। आंख, नाखून, मल, मूत्र तथा जिव्हा कुछ पीली-लाल हो जाती हैं। शरीर का रंग पीला पड़ जाता है। कब्ज बहुत रहने लगती है। मनुष्य का स्वभाव क्रोधी व चंचल हो जाता है।

जल तत्त्व अधिकतर पृथ्वी तत्त्व को दबा लेता है। अग्नि तत्त्व तथा वायु तत्त्व जल तत्त्व के विपरीत तत्त्व है। जल तत्त्व की उपस्थिति में क्षणभर में लाभ होता है। पृथ्वी तत्त्व तथा जल तत्त्व के मेल से मनुष्य को पूर्ण लाभ प्राप्त होता है। ऐसा स्वर-विज्ञान के विशेषज्ञों का मत है।

पृथ्वी तत्त्व

मनुष्य शरीर में पृथ्वी तत्त्व का निवास मूलाधार चक्र में है। हमारे शरीर में पैर से घुटने तक का भाग पृथ्वी तत्त्व अंश है। जो ठोस है, कठोर है। वह पृथ्वी तत्त्व है। पृथ्वी तत्त्व का रंग पीला है। मनुष्य भी एक मिट्टी का पुतला है। पृथ्वी माता की गोद में हम जन्म से लेकर मृत्यु तक खेलते हैं। मिट्टी से ही फल, फूल, अन्न आदि की उत्पत्ति होती है। मिट्टी के विभिन्न प्रयोग से अनेक रोगों की चिकित्सा होती है।

गांधी जी ने स्वयं अपने ऊपर मिट्टी के अनेक प्रयोग किए हैं। एक बार गांधी जी ने एडोल्फ जुस्त की लिखी हुई “रिटर्न टू नेचर’ नामक पुस्तक पढ़ी। इस पुस्तक में विशेष रूप से मिट्टी के उपयोग पर जोर दिया गया है। गांधी जी को कब्ज रहती थी। उन्होंने स्वयं मिट्टी की पुलटिस बनाई और स्वयं अपने पेडू पर रखी। सवेरे उनका पेट अच्छी तरह साफ हुआ। इससे गांधी जी को मिट्टी चिकित्सा पर विश्वास बढ़ा।

गांधी जी ने सेवाग्राम में सिर दर्द तथा टायफायड के अनेक रोगी मिट्टी के द्वारा ठीक किये। सेवाग्राम में बिच्छु का उपद्रव तो प्रतिदिन की बात थी परन्तु गांधी जी को किसी भी केस में असफलता नहीं मिली। मिट्टी हमारे शरीर से विजातीय द्रव्य निकालकर हमें स्वास्थ्य प्रदान करती है। मिट्टी का गुण अथवा तन्मात्रा गन्ध अथवा सूंघने की शक्ति का है। इसका धर्म सुकड़ना तथा खुशकी करना है जब शरीर के बाहरी अथवा आन्तरिक अंग में किसी भी कारण वश जल तत्त्व या आकाश तत्त्व में अधिकता अथवा न्यूनता हो जाती है तो मिट्टी तत्त्व का प्रयोग अति उत्तम लाभदायक होता है।

मिट्टी तत्त्व की अधिकता से शरीर में प्यास, नींद तथा खुशकी बढ़ जाती है। नेत्र, नाखून, मल, मूत्र तथा जिव्हा का रंग सफेद-पीला हो जाता है। खुशक खारिश भी होने लगती है। मुंह का स्वाद मीठा प्रतीत होता है। पृथ्वी तत्त्व ढाई घड़ी (एक घण्टा) में 50 पल (20 मिनट) तक विद्यमान रहता है। पृथ्वी तत्व में श्वास का प्रमाण 12 अंगुल का होता है। पृथ्वी तत्त्व में नासा छिद्र से नीचे की ओर श्वास चलता है। इस तत्त्व में दर्पण पर जोर से श्वास छोड़ने पर चतुष्कोण आकृति बनती है।

पृथ्वी तत्त्व की न्यूनता से अपच, कब्ज, मन्दाग्नि तथा अरुचि आदि पैदा हो जाते हैं। शरीर में दर्द, नाक से दुर्गन्ध तथा रक्त-विकार उत्पन्न हो जाते हैं। नेत्र, नाखून, मल, मूत्र आदि कुछ नीले से पड़ जाते हैं। पृथ्वी तत्त्व कुछ जल तत्त्व को दबा सकता है। पृथ्वी तत्त्व के विपरीत अधिकतर जल तत्त्व है

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