पहाड़ी क्षेत्रों के 5 औषधीय पौधे और उनके उपयोग | 5 Medicinal plants in hilly areas

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आज हम 5 औषधीय पौधे Medicinal plants in hilly areas और उनके उपयोग बताने जा रहे हैं, जिसके प्रयोग से कई गंभीर बीमारियों से बचा जा सकता है. प्रकृति का एक विशेष गुण है. आप जिस जलवायु में रहते हैं, और जिस जलवायु के कारण आपको बीमारी होती है, उसी जलवायु में प्रकृति उन बीमारियों के इलाज के लिए वनस्पति भी पैदा कर देती है. लेकिन एलोपेथी के दिनोंदिन बढ़ते विस्तार के कारण आम जनमानस आस पास प्रकृति में पाए जाने वाले औषधीय पौधे और उनके उपयोग को भूल गया है. पुराने समय में बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सबका इलाज प्रकृति में पाई जाने वाली वनस्पति से ही किया जाता था. स्वस्थ व्यक्ति भी उस वनस्पति का प्रयोग करके बीमारी दूर रखते थे.

5 औषधीय पौधे और उनके उपयोग | 5 medicinal plants found in hilly areas

1. अतीस

अतीस का पौधा

अतीस पहाड़ी इलाकों में पाए जाने वाला एक औषधीय पौधा hilly area plant है. इसकी जड़ तथा तने का औधधि बनाने में प्रयोग होता है.

अतीस के पौधे की पहचान

अतीस का पौधा  1 से 3 फीट लम्बा होता है. यह एक तने का सीधा पौधा होता है. इसके तने पर ही छोटी छोटी डंठलें होती हैं. इस्सका फूल पीलापन लिए हुए हल्का बैंगनी होता है. इसके बीज पकने पर काले और चपटे हो जाते है. इसका तना सूखकर पतला हो जाता है, तथा खाने में कडवा होता है.

अतीस का पौधा कहाँ मिलता है

अतीस का पौधा विशेष तौर पर पहाड़ी इलाकों जैसे उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश आदि में पाया जाता है. इसके अलवा यह 2400 से 3600 मीटर की ऊंचाई वाले मैदानी इलाकों में भी बहुतायत से मिलता है.

अतीस के पौधे के औषधीय गुण | अतीस के फायदे

अतीस के पौधे को सर्वव्याधिहर कहा गया है. अतीस वत्सनाभ कुल की औषधि है. वत्सनाभ कुल की औषधियां विषैली होती हैं. लेकिन अतीस विषैली नहीं होती. इसका विष बेहद सूक्ष्म बैक्टीरिया को ख़त्म करता है. इसलिए यह बच्चों में संक्रमण (infection) होने वाले पेट के कीड़े, शूल, ग्रहणी रोग, खांसी, उलटी, दस्त आदि रोगों की रामबाण दवाई है. अतीस का प्रयोग अतिविषा चूर्ण, बालचातुभद्र चूर्ण, महासुदर्शन चूर्ण, अमृतारिष्ठ चंद्रप्रभावटी, गंगाधर रस आदि औषधियों में होता है.

2. वत्सनाभ (मीठा विष)

वत्सनाभ पहाड़ी इलाकों में पाई जाने वाली औषधीय वनस्पति है. इसकी जड़ तथा तने का प्रयोग औषधियां बनाने में किया जाता है.

वत्सनाभ के पौधे की पहचान

वत्सनाभ का पौधा

वत्सनाभ का पौधा 1 से 4 फुट तक की लम्बाई का होता है. इसमें चमकीले नीले रंग के फूल लगते हैं. इसका तना और फल स्वाद में बेहद कडवे होते हैं. यह एक तीव्र विष है. इसके बीज काले तथा चपटे होते हैं.

वत्सनाभ का पौधा कहाँ मिलता है

वत्सनाभ का पौधा उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश आदि पर्वतीय इलाकों में पाया जाता है. इसके अलवा यह 2400 से 3600 मीटर की ऊंचाई वाले मैदानी और ढलान वाले इलाकों जैसे जम्मू आदि में भी बहुतायत से मिलता है.

वत्सनाभ के पौधे के औषधीय गुण | वत्सनाभ के फायदे

वत्सनाभ बल्य (बलवर्धक), शीतहर, उष्ण, संक्रमण रोधी, पसीने और मूत्र को बढाने वाला वात-कफ जन्य बीमारियों में उपयोगी है. लकवा, गठिया वात आदि व्याधियों में भी इसका लाभ होता है. यह संजीवनी वटी, मृत्युन्जय्रस, हिन्गुलेश्वर, पंचामृत रस, जयावटी, कफकेतु रस, आनंद भैरव रस, विषगर्भ तेल, अमृत रसायन आदि औषधियों में प्रयोग की जाती है.

3. कुटकी

यह औषधि पहाड़ी इलाकों में पाए जाने वाला औषधीय पौधा है. इसका तना और जड़ औषधि बनाने में प्रयोग की जाती है.

कुटकी के पौधे की पहचान | कुटकी का पौधा दिखाएं

कुटकी का पौधा कई तनों वाला एक झाड़ी के सामान होता है. इसका ताना लम्बा, कमजोर और पतला होता है. इस पर बैंगनी नीले फूल लगते हैं. इसकी पत्तियां 3-4 इंच तक होती हैं.

कुटकी का पौधा दिखाएँ
कुटकी का पौधा

कुटकी का पौधा कहाँ मिलता है

कुटकी का पौधा हिमालय की तलहटी में उत्तराखंड, भिलंगना घाटी, भागीरथी घाटी, अलकंदा घाटी, जमुना घाटी, पिंडार घाटी, तपोबन, नीतीघाटी, रूपकुंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश आदि पर्वतीय इलाकों में पैदा होता है. इसके अलवा यह 2400 से 3600 मीटर की ऊंचाई वाली नम, छायादार, पथरीली भूमि पर भी उगता है. अत्यधिक दोहन के कारण इन इलाकों से कुटकी लुप्तप्राय: हो गयी है. अब हिमालय की ऊंची और दुर्गम चोटियों पर ही कुटकी का पौधा मिलता है.

कुटकी के औषधीय गुण | कुटकी के फायदे | kutki ke fayde

कुटकी एक महान दीपन औषधि है. यह रक्त संचार में वृद्धि करती है. चयापचयन में वृद्धि करती है. कुटकी ज्वर, रक्तविकार, कुष्ठ, डाह, विषमज्वर, प्रमेह आदि रोगों मन उपयोगी है.

4. सालमपंजा

सालमपंजा पर्वतीय इलाकों में पाया जाने वाला एक औषधीय पौधा है. इसकी जड़ और तना औषधि निर्माण में काम आता है.

सालमपंजा के पौधे की पहचान

सालमपंजा का पौधा

सालमपंजा का पौधा 25-30 इंच ऊंचा होता है. इस पर हल्के बैंगनी फूल  लगते हैं. इसका ताना पतला तथा हलके पीले रंग का होता है. इसकी पत्तियां भालाकर और हल्का पीलापन लिए होती हैं.

सालमपंजा का पौधा कहाँ मिलता है

सालमपंजा का पौधा हिमालय की भिलंगना घाटी, भागीरथी घाटी, मन्दाकिनी घाटी, अलकनंदा घाटी, जमुना घाटी, टौंस घाटी, वेदनी दुग्याल, रूपकुंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर, सिक्किम, एवं अरुणाचल प्रदेश के इलाकों में पाया जाता है. बुग्याल इलाकों में मवेशियों और अत्याधिक दोहन के कारण इसकी उपलब्धता कम हो गयी है. लेकिन दुर्गम घाटियों और पहाड़ियों पर यह बहुतायत में मिलता है.

सालमपंजा के औषधीय गुण

सालमपंजा एक पौष्टिक, बलवर्धक एवं वीर्यवर्धक औषधीय पौधा है. इसके तने का प्रयोग पौष्टिक आहार में किया जाता है. सालमपंजा पहाड़ी बुग्यालों और तलछटियों में चरने वाली गाय और बकरियों का प्रिय है. इसके सेवन से उनका दूध उच्च गुणवत्ता वाला होता है.

5. चिरायता

चिरायता एक पर्वतीय क्षेत्रों में पाया जाने वाली औषधीय वनस्पति है.  इसके जड़, कंद, पत्तियां, फूल और फल सभी औषधीय सामग्री बनाने के काम आते हैं.

चिरायता के पौधे की पहचान

चिरायता का पौधा

चिरायता का पौधा लगभग 30 सेमी से 80 सेमी तक की लम्बाई का होता है. इसकी पत्तियां नुकीली होती हैं. इसका तना, पत्तियां तथा फल स्वाद में कडवे होते हैं. इसके फूल हरापन लिए हुए बैंगनी रंग के होते हैं. जुलाई और अगस्त महीने में इसमें पुष्प आता है तथा सितम्बर में इसका फल पक जाता है.

चिरायता का पौधा कहाँ मिलता है

उत्तराखंड हिमालय में भिलंगना, भागीरथी, मन्दाकिनी, अलाकंदा, पिंडार, पंचूली, दारमा, वेदनी, महमहेश्वर आदि घाटियों में चिरायता का पौधा मिलता है. इसके अलावा हिमालय के तलहटी वाले इलाकों जैसे हिमाचल प्रदेश, नेपाल, जम्मू कश्मीर, सिक्किम, दार्जिलिंग, अरुणाचल प्रदेश में भी चिरायता का पौधा आसानी से मिल जाता है. मैदानी इलाकों और बुग्यालों में इसकी खेती भी होती है.

चिरायता के औषधीय गुण

चिरायता शोथ, अर्श, कास, श्वास, कुष्ठ, व्रण विकार, जीर्ण ज्वर, तीक्ष्ण एवं विषम ज्वर में लाभदायक है.

यह आर्टिकल plants in hilly areas यानी पर्वतीय क्षेत्रों में पाए जाने वाले hilly area plants, या hilly areas plants की पहचान और उनके फायदों को बताने के लिए लिखा गया है.

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