शीर्षासन के फायदे और नुकसान व सावधानियां

शीर्षासन आसनों का शिरोमणि है। इसकी महिमा जितनी भी कही जाय, कम है। शीर्षासन ही एक ऐसा आसन है, जिसके करने से मस्तिष्क को पर्याप्त प्राण और रक्त मिल सकता है। आइये जानते हैं शीर्षासन के फायदे और नुकसान के बारे में.

गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्त के विरुद्ध केवल इसी आसन के अभ्यास द्वारा मस्तिष्क को हृदय से अधिक से अधिक रक्त मिलता है। इस आसन के अभ्यास से स्मरण शक्ति खूब बढ़ती है। जिनको दिमागी काम बहुत करना पड़ता है जैसे वकील, छात्र और ध्यान लगाने वालों के लिये तो यह आसन ईश्वर की देन है। यदि ध्यान करने से पहले शीर्षासन लगाया जाये तो बड़ा लाभ होता है। युवा तथा बलवान् लोगों को यह आसन अवश्य चाहिये। इस आसन से अकथनीय लाभ होते हैं। यह आसन समस्त रोगों की एक ही रामबाण दवा है। योगतत्व रूप में लिखा है कि जो इस आसन को नित्य तीन घंटे करते हैं काल को भी जीत लेते हैं। शीर्षासन अन्य नामों से, जैसे कपाली आसन, वृक्षासन, विपरीतकरणी मुद्रा आदि के नाम से भी प्रसिद्ध है। इसके लाभ अनगिनत हैं।

शीर्षासन की विधि

एक चौकोर कम्बल बिछायें। दोनों घुटनों के बल बैठ जायें। अब दोनों हाथों की अँगुलियों को परस्पर फँसा कर दोनों हाथ जमीन पर घुटनों के सामने रखें। अब अपना सिर दोनों फँसे हुए हाथों के बीच में रखें। धीरे-धीरे दोनों टांगों को ऊपर उठा कर सीधा करें। इसी अवस्था में अपना मेरुदंड तथा टाँगें एक सीध में रखें। आरम्भ में पाँच सेकंड तक इस दशा में रहें। इस तरह समय में 15 सेकंड रोज जोड़ते जायें और आधे घंटे तक इसी आसन से खड़े रहने का अभ्यास करें। स्वस्थ आदमी दो या तीन महीने के अभ्यास में ही आधे घंटे तक इस आसन पर खड़ा रह सकता है

शीर्षासन के फायदे और नुकसान व सावधानियां

प्रारंभ में सिर के बल खड़े होने में अधिकतर सभी साधकों को समस्या होती है। इसलिए इसलिए प्रारंभ में यह आसन किसी के सहयोग से दीवार का सहारा लेकर करना चाहिए। और यह ध्यान रहे कि गिरने पर चोट न लगे। यह भी ध्यान रखना चाहिए। कि आसपास ऐसा कोई सामान नहीं होना चाहिए। की गिरने से उसकी चोट लगे। आरम्भ में सफलता न मिलने से चिन्तित न होना चाहिये। धैये और शान्ति पूर्वक लगकर इस आसन का अभ्यास करने से ही सफलता मिलेगी।

इस आसन को 5 या 10 मिनट अवश्य करना चाहिए। जब सिर के बल खड़ा होना हो, तो सांस भरकर रोक लेना चाहिए। और जब आसन समाप्त कर वापस जमीन पर आना हो, तो भी सांस गति रोक कर ही पैरों को धीरे-धीरे नीचे लाया जाए जब आप पैर ऊपर ले जाएं तो शरीर अर्थात कमर और पैर सब तने होने चाहिए। धीरे-धीरे सांस लेते रहें। आसन, प्राणायाम और जप साथ ही साथ किये जाने चाहिये आसन करते समय अपने इष्टदेव के मन्त्र का जप करना चाहिये।

शीर्षासन के लाभ

शीर्षासन से शारीरिक लाभ

  • शीर्षासन से ब्रह्मचर्य रक्षा में बड़ी सहायता मिलती है इसके अभ्यास से मनुष्य ऊध्वरेता हो जाता है।
  • शीर्षासन के अभ्यास से वीर्य ओज में परिवर्तित हो जाता है। इस आसन को करते समय अभ्यास करने वाले को सदा कल्पना करते रहना चाहिये कि उसका वीर्य (शक्ति और उत्साह) ओज बनता हुआ मेरुदण्ड में से होकर मस्तिष्क में जाकर जमा हो रहा है।
  • शीर्षासन को इन्द्रिय निरोधक भी कहते हैं। इस आसन को करने वाले को स्वप्नदोष नहीं होते। ऊध्वरेता मनुष्य में वीर्य का प्रवाह मस्तिष्क की तरफ होने लगता है, जिससे आध्यात्मिक शांति की वृद्धि होती है जिससे ध्यान लगाने में बड़ी सहायता मिलती है।
  • शीर्षासन से शरीर की सुस्ती दूर होती है तथा शरीर आलस्य रहित हो जाता है। शरीर में ताजापन, फुर्ती और बल आता है।
  • शीर्षासन से पेट और आँतों की सब बीमारियाँ दूर हो जाती हैं और दिमागी ताकत बढ़ती है।
  • शीर्षासन बड़ा रक्त शोधक और स्नायुओं के बल को बढ़ाने वाला है। आँख, कान, नाक, सिर, गले, पेट, जननेन्द्रिय, यकृत, प्लीहा और फेफड़े, आदि के जितने रोग हैं सब शीर्पासन के नियमित अभ्यास द्वारा अच्छे हो सकते हैं।
  • शीर्षासन से मेरुदंड यानि रीढ़ की हड्डी सबल और लचीली बनती है, जिससे बुढ़ापा शीघ्र नहीं आता है।
  • इस आसन से दांत मजबूत बनते हैं।
  • शीर्षासन से पाचन क्रिया अच्छे ढंग से संपन्न होती है। चेहरा भरा रहता है मुख पर तेज उत्पन्न होता है और सुंदरता बढ़ जाती है आंखे तेज युक्त हो उठती हैं।
  • इस आसन से आंखों की शक्ति भी बढ़ती है।
  • शीर्षासन से प्रमेह, स्वप्नदोष, पायरिया, बांझपन, तपेदिक, दमा, स्नोफीलिया, मूत्रशय का दर्द, गठिया, मोटापा आदि दूर होते हैं।
  • इस आसन से प्रोस्टेट ग्लैंड एवं पिस्ट्युट्री ग्रैंड को बहुत लाभ मिलता है।
  • महावारी की समस्या ठीक होती है।
  • बहरापन, सूजाक, बहुमूत्र, अर्ष, श्वास यक्ष्मा, पायेरिया, कब्ज, उदरशूल, गर्मी आदि सभी रोग आसन के अभ्यास से नष्ट होते हैं।
  • इस आसन के करने से जठराग्नि प्रज्वलित होती है।
  • झुर्रियां और वालों का सफेद होना इसके अभ्यास से दूर हो जायगा।
  • इस आसन का अभ्यास करने वाली स्त्रियों के गर्भाशय और जननेन्द्रिय सम्बन्धी रोग अच्छे हो जाते हैं। गर्भाशय के विकार दूर होते हैं। बाँझपन गायब हो जाता है।

शीर्षासन से मानसिक और आध्यात्मिक लाभ

  • शीर्षासन करने से प्राणायाम और समाधि स्वतः होने लगती है। प्राणायाम और समाधि लगाने के लिये अलग अभ्यास की आवश्यकता ही नहीं।
  • इस आसन को अभ्यास करते समय श्वास-प्रश्वास धीरे-धीरे स्वतः ही महीन होता जाता है। आरम्भ में साँस लेने में होनेवाली कठिनाई बिल्कुल दूर हो जाती है।
  • अभ्यास बढ़ने से इस आसन द्वारा बड़ा आनन्द और उत्साह का अनुभव होने लगता है। ध्यान लगाते ही अनाहत शब्द स्पष्ट सुनाई देने लगता है।
  • आध्यात्मिक उन्नति चाहने वाले लोगों को अनहद नाद सुनाई पड़ने लगता है कुंडलिनी जागृत होती है। इस आसन से मस्तिष्क को ताकत मिलती है तथा स्मरण शक्ति बढ़ती है
  • यह आसन शीर्षासन वृक्षासन विपरीत करनी मुद्रा और कपाली आसन के नाम से भी प्रसिद्ध है।

    शीर्षासन में सावधानियां

  • इस आसन को बहुत धीरे-धीरे बिना झटके के करना चाहिए।
  • इस आसन में सिर के बल खडे होकर नाक से धीरे-धीरे साँस लेनी चाहिये। मुंह से कभी साँस नहीं लेना चाहिए।
  • आरम्भ में किसी मित्र की सहायता या दीवार के सहारे से अभ्यास करना अच्छा है।
  • इस आसन को समाप्त कर पाँच मिनिट आराम करने के बाद एक प्याला दूध पीना चाहिये। जो लोग कि 20 मिनिट या आधे घंटे इस आसन का अभ्यास करते हों उन्हें आसन करने के बाद हल्का जलपान और दूध अवश्य पीना चाहिये।
  • गर्मी के दिनों में इस आसन को अधिक देर तक न करना चाहिये। जाड़े में इस के अभ्यास में इच्छानुसार अधिक से अधिक समय दिया जा सकता है।
  • इस आसन के अभ्यास से यदि सुस्ती या बेचौनी का अनुभव हो, तो यह आसन नहीं करना चाहिए।
  • शीर्षासन करने के बाद कम से कम 2 मिनट तक शवासन अवश्य करना चाहिए।
  • इस आसन का अभ्यास खाली पेट करना चाहिए। यदि समय मिले तो सवेरे शाम दोनों समय इसका अभ्यास करना चाहिए।

शीर्षासन के नुकसान

यदि आप शीर्षासन करते समय निम्न सावधानियां नहीं रखते हैं, तो आपको लाभ के स्थान पर नुकसान उठाना पड़ सकता है.

  • हाई बीपी और हृदय रोगी; बहुत कमजोर एवं बहुत वृद्ध; गर्भवती तथा रजस्वला स्त्री, नाक, आंख के रोगी, कान बहने के रोगी; जिन लोगों को मेरुदंड या रीड की हड्डी में कोई रोग है या रीढ़ की हड्डी में फ्रैक्चर हो या कमर में दर्द हो; जिन लोगों की आंखों में लाली आती हो या नाक में सूजन हो, ऐसे रोगी रोग ठीक होने तक यह आसन न करें।
  • जब आप बहुत थके हों या चिंताग्रस्त हों, तो तो शीर्षासन से पहले कम से कम 5 मिनट शवासन कर ले तब शीर्षासन करें।

शीर्षासन के प्रकार

  • अर्ध वृक्षासन – शीर्षासन करने के समय पैर मोड़ कर पालथी मार सिर के बल खड़े रहने को अर्ध वृक्षासन कहते हैं
  • मुक्तहस्त वृक्षासन – दोनों पंजों को न जकड़ कर दोनों हाथ सिर के पास जमीन पर रखने चाहिये।
  • हस्त वृक्षासन – इस आसन में केवल हाथों के बल खड़े होना चाहिये और सिर को जमीन पर न रख कर अधर में ही रखना चाहिये। इस आसन को दीवार के सहारे करें। फिर धीरे-धीरे अभ्यास बढ़ने पर दीवार का सहारा छोड़ जा सकता है।
  • एकपाद वृक्षासन- शीर्षासन खड़े होकर धीरे एक पैर मोड़ कर उसकी एड़ी दूसरी जाँघ पर रखनी चाहिये इसी का नाम एकपाद वृक्षासन है।
Healthnia